September 06, 2007

दोषी कौन?

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बहुत दिनों से मेरे कई पठकों की शिकयत थी कि मैंने कोई नया लेख नहीं लिखा। सच यह है कि लिख्नना चाहता था पर कोई ऐसा विषय नहीं सूझ रहा था कि जिसका विचार आते ही लगे “हाँ यह विषय लिखने योग्य है।“ केवल लिखने भर के लिए कुछ भी लिख डालना मेरी आदत का हिस्सा नहीं। खैर।

आइए कुछ गत वर्षों में हुई घटनाओं पर नज़र डालें। इन घटनाओं ने मेरे मन में कुछ सवाल उत्पन्न किए जिनके उत्तर मैं आज भी खोजता हूँ। या फिर मैं जानता हूँ – पर कौन पचडों में पडे। हाल ही दिनों में घटित कुछ घटनाओं ने मुझमें सोई आग को फिर से हवा दी। आज सुबह जब इस लेख को लिखने के विचार से बिस्तर छोडा तो महसूस किया कि मैं जाग गया।

कुछ वर्ष पहले दिल्ली के प्रख्यात (या कुख्यात) बुद्धा जयंती पार्क में एक लडकी के साथ कुछ लोगों ने बलात्कार किया। न्यूज़ चैनल को दो-तीन दिन का मसाला मिल गया। हर चैनल पर चर्चा हुई कि दिल्ली औरतों के लिए कितनी असुरक्षित हो गई है। जो चर्चाएँ हुईं - सब सही था। पर किसी ने एक सवाल का जवाब नहीं दिया – वो लडकी शाम के उस समय उस पार्क में क्या कर रही थी, या गई क्यों। चैनल द्वारा दिए ब्यौरे से यह तो स्पष्ट था कि लडकी को वहाँ उठाकर नहीं लाया गया था, वो मौजूद थी। पर कौन पचडों में पडे।

गत वर्ष दिल्ली में एक बस में बम विस्फोट हुआ। कथित रूप से बस ड्राइवर लोगों की जान बचाते हुए शहीद हुए। घटना कुछ यूँ है। बस में अचानक संदिग्ध बम होने की खबर फैली। ड्राइवर ने बस एक तरफ़ रोकी। उसने बहादुरी दिखाई और उस संदिग्ध बम को बस से बाहर फैंक रह था के वो फट गया। ड्राइवर की मृत्यु हो गई। शाम को न्यूज़ चैनल उसकी बहादुरी की चर्चाओं से भर गए। पर मेरे एक सवाल का जवाब मुझे नहीं मिला। बसों, रेलगाडियों, स्टेशनों पर बडा बडा और बिल्कुल स्पष्ट लिखा रहता है “क़ोई भी लावारिस वस्तु बम हो सकती है। उसे छुएँ नहीं। उसकी सूचना तुरंत नज़दीकी अधिकारी को दें।“ ऐसी परिस्थिति में उस बम को उठाना बहादुरी कहूँ या मूर्खता? पर कौन पचडों में पडे।

पिछ्ले दिनों में कहीं लेख पडा कि ज्योतिषी लूटते हैं। सच है कुछ झोला-छाप ज्योतिषी बन कर बैठ गए हैं। गत वर्ष मैं किसी चैनल के लिए रिकॉर्डिंग कर रहा था। मैं अपने बेबाक बोलने के लिए कुख्यात हूँ। पहली रिकॉर्डिंग के दौरान ही चैनल और विशेष ज्योतिषी वर्ग समझ गया कि अब इन झोला छाप की खैर नहीं। चैनल व उस लॉबी विशेष से बार बार अनुरोध आया कि मैं उन बातों को न कहूँ जो चर्चा व तनाव उत्त्पन करें। मैं अपने कार्यक्रम की शैली अन्य कार्यक्रमों जैसी ही रखूँ। अंततः मुझे वो कार्यक्रम छोडना ही पडा।

सवाल यह है कि यह झोला छाप एक दुकान चलाते हैं। और आप उनसे क्या खरीदने जाते हैं? तत्काल आराम। अब तत्काल आराम तो होता है – आपको या झोला छाप को?

मैं अक्सर सभी से कहता हूँ – डॉक्टर, वकील और ज्योतिषी के पास लोग तब जाते है जब पूरी तरह फ़ँस जाते हैं। फँसने से पहले क्यों नहीं। बाकी दोनों अपने विषय में खुद ही बेहतर बता सकते हैं। हाँ ज्योतिषी से नियमित मिलना सामान्य स्वास्थ्य जाँच जैसा ही है। कुछ बुद्धिमान लोगों ने मेरे इस परामर्श का भरपूर लाभ उठाया है। अब वे मेरी बात का आशय समझने लगे हैं। अक्सर हर मुलाकात में उनका आखिरी सवाल यही होता है कि अब आपसे दुबारा कब आकर मिलना चाहिए।

समझाने कहने की बातें और भी हैं, पर कौन पचडों में पडे।

This article is written by Sanjay Gulati Musafir and originates at: http://sanjaygulatimusafir.blogspot.com/

August 20, 2007

जान है तो जहान है, हृदय है तो जान है।

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आजकल हृदयाघात की समस्या बढ़ती जा रही है। अब हर तीसरे इंसान को यह डर लगा रहता है... मै हृदय रोगी तो नही"।

ऐसे मे जरूरत है थोड़ी जागरूकता की, अपने सामान्य जीवन मे थोड़े से फेर बदल की, जिससे आप इस थकाऊ, खर्चीले बीमारी से दूर रहेंगे।


1. अपने खान-पान पर ध्यान दीजिये, जरूरत के अनुसार खाईये। जहाँ तक हो सके तैलीय पदार्थो से दूर ही रहिये।
सामान्य तौर पर महिलाओ की एक आदत होती है, खुद भले ही रूखी-सुखी खा लेती है, पर घर के और लोगों को घी मे चुपड़ी रोटी खिलाती हैं, इस तरह कि आदत से बचना ही श्रेयष्कर होगा। इसलिये अपने घर की महिलाओ को यह बात समझानी चाहिये कि "जिससे हो दुश्मनी निभानी, उसे है घी रो-टी खिलानी, अपनो को दिल से अपनाईये, भले ही रूखी-सूखी खिलाईये।"

मुझे अक्सर बुजुर्ग लोग यह कहते हुए मिलते हैं कि आजकल के बच्चो मे तो अब वो बात नही रही, पहले हम इतना घी खाया करते थे और पचा जाते थे, बहूत ताकतवर होते थे... इत्यादि।
ऐसे भ्रम से दूर ही रहना चाहिये, तब एक घर मे 7 भाई होते थे और उनमे अधिकांश उम्र के पहले ही गुज़र जाते थे, दूसरी बात की तब के परिवेश मे और आज के परिवेश मे बहूत ज्यादा अंतर हो गया है।
तब शारीरिक मेहनत ज्यादा होती थी और अब मानसिक मेहनत का जमाना है। अब कुदाल चलाना नही रहा, बल्कि मशीनीकरण हो रहा है हर तरफ।

2. खुद को फ़ालतू की परेशानियों मे नही डालना चाहिये, एक कहावत है "जब पैसे ना थे तो कमाने की परेशानी, हो गये तो बचाने की परेशानी"। भगवान ऐसी आदत से बचाये। आप समझ रहे होंगे, मै क्या कहना चाहती हूँ :)।

3. आज की सबसे बड़ी परेशानी "लोग क्या कहेंगे"। इस तरह के चक्कर मे पड़ कर किसी भी हानिकारक व्यवस्था को ना ही अपनायें, कहने का मतलब है कि, सिर्फ दिखावे के लिये किसी भी नशे का आदी नही बनना चाहिये। मै ऐसा इसलिये कह रही हूँ क्युँकि कई लोग यह कहते मिलते हैं "क्या करूँ मेरी ऐसी आदत ना थी, पर दोस्तो के लिये...., या फिर अपने आपको को उच्च प्रोफाईल मे लाने के लिये ऐसी आदत डाल ली... इत्यादि, ऐसी आदत से तौबा ही रखना चाहिये, ऐसी कोई भी ऐसी आदत नही डाले जो स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो।

4. 30 साल की उम्र के बाद नियमित रूप से अर्जुन क्वाथ का सेवन करें, याद रहे यह कोई दवा नही बल्कि हृदय के लिये अमृत है, इसलिये निःसंकोच इसका सेवन करें।

5. 35 साल की उम्र के बाद नियमित रूप से वार्षिक T.M.T टेस्ट कराना चाहिये।

T.M.T टेस्ट ना कराने की वजह होती है, इसे लोग फालतु का खर्च मान बैठते हैं, जो कि गलत है, यह फालतु खर्च नहीं बल्कि बीमारी होने के बाद, होने वाले खर्च और परेशानी से बचने का तरीका है।
दुसरा तथ्य है कि कितने लोग बीमारी पकड़े जाने के डर से टेस्ट नही कराते, यह भी गलत है, कोई बिमारी आपको अन्दर ही अन्दर खोखला करे उससे अच्छा है कि पहले ही उसका पता लग जाये, ताकि समय रहते समाधान किया जा सके।

6. हास्य चिकित्सा को अपने जीवन मे स्थान दिजिये, मतलब की हँसिये, और दुसरो को भी हँसाईये।

7. ढ़ृढ़ इच्छाशक्ति रखिये, गलतियों से सीख लिजिये, कुंठा का शिकार मात बनिये।

8. सेल्फ मेडिटेशन फॉर हॉर्ट जरूर सीखिये.... (कौन बतायेगा? मै हूँ ना :D)
ना सीखने वाले के पास भी अपने तर्क हैं... फालतु का खर्चा कौन करें... जनाब यह खर्च नही स्वस्थ्य रहने का उपाय है।
अब मेडिटेशन के लिये वक्त नही बचता... अर्रे आज वक्त नही है... (कल को बिमारी पकड़ ली तो वक्त ही वक्त रहेगा... आपकी मर्जी... मेरा काम तो मात्रा बताने/सीखाने भर का है।) अब कुछ नही कहूँगी वरना लगेगा मै प्रोमोशन करने मे लगी हूँ :)।


यह तो रहा हृदय को बीमारींयों से बचाने का तरीका, वो क्या करें जिन्हे यह बीमारी लग गयी है... अगले अंक मे उस उपाय के साथ आऊँगी... तब तक लिये टाटा ।

July 31, 2007

सूर्य चिकित्सा और रंगो से सरल उपचार

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सूर्य चिकित्सा पूर्ण रूप से एक प्राकृतिक उपचार है अब यह वैज्ञानिक पद्धति भी है और एक धार्मिक अनुष्ठान भी है।

पुराने समय से जब सूर्य उपासना होती थी उसमे लोगो की श्रद्धा और विश्वास का समन्वय था, वो अब भी चला आ रहा है ...
पहले सूर्य पूजा को सिर्फ़ एक धार्मिक अनुष्ठान माना जाता था। पर अब इसे वैज्ञानिक पुष्टि मिलती जा रही है , और अब यह चिकित्सा पद्धति के रूप मे अग्रसर हो रहा है।

एक गलत अवधारणा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि इससे हानि होने की सम्भावना है जैसे कि कई तरह के कई चर्म
रोग हो जाते हैं पर सही तरीके से इसका सेवन करें तो बस फायदे ही फायदे हैं.. और यह तो हम सब जानते हैं कि "अति सर्वत्र वर्जयेत " ।

ध्यान रहे की सुर्य चिकित्सा दिखता तो आसान है पर विशेषज्ञ से सलाह लिये बिना ना ही शुरू करें।
जैसा की हम जानते हैं कि सूर्य की रोशनी में सात रंग
शामिल हैं .. और इन सब रंगो के अपने अपने गुण और लाभ है ...


1. लाल रंग ... यह ज्वार, दमा, खाँसी, मलेरिया, सर्दी, ज़ुकाम, सिर दर्द और पेट के विकार आदि में लाभ कारक है


2. हरा रंग .... यह स्नायुरोग, नाडी संस्थान के रोग, लिवर के रोग, श्वास रोग आदि को दूर करने में सहायक है


3. पीला रंग ...... चोट ,घाव रक्तस्राव, उच्च रक्तचाप, दिल के रोग, अतिसार आदि में फ़ायदा करता है

4. नीला रंग.....दाह, अपच, मधुमेह आदि में लाभकारी है

5. बैंगनी रंग.... श्वास रोग, सर्दी, खाँसी, मिर् गी ..दाँतो के रोग में सहायक है

6. नारंगी रंग... वात रोग . अम्लपित्त, अनिद्रा, कान के रोग दूर करता है

7. आसमानी रंग... स्नायु रोग, यौनरोग, सरदर्द, सर्दी- जुकाम आदि में सहायक है


सुरज का प्रकाश रोगी के कपड़ो और कमरे के रंग के साथ मिलकर रोगी को प्रभावित करता है।

अतः दैनिक जीवन मे हम अपने जरूरत के अनुसार अपने परिवेश एवम् कपड़ो के रंग इत्यादि मे फेरबदल करके बहुत सारे फायदे उठा सकते हैं।


हमे जिस रंग की ज़रूरत हो हम उसका इस्तेमाल करके अपने रोग दूर कर सकते हैं ।


सुर्य चिकित्सा मे पानी, कृस्टल, सुर्य स्नान, सुर्य प्राणायाम, इत्यादि तरीके अपनाये जाते हैं, जो रोगी की बिमारी, एवम् द्शा देखकर निर्धारित किया जाता है।

सुर्य नमस्कार योग तो अपने आपमे समपन्न योग है, इससे मिलने वाले लाभ से कोई भी अनभिज्ञ नही है। अब तो सुर्य मंत्रो को और सुबह जल-अर्घ्य को भी महत्वता मिलती जा रही है।

जलार्पण के लिये भी निर्दिष्ट नियम हैं, और इसका पालन करके हम कई तरह के समस्याओ से निजात भी पा सकते हैं।


इस तरह हम कह सकते हैं कि आज के दौर मे सुर्य चिकित्सा हमारे जीवन ले हरेक पहलू मे कारगर है, शायद इसी कारण से हमारे पुर्वजो ने सुर्य उपासना पर बल दिया था, ताकि हम रोज ही खुद को सुख समृद्धि के दिशा मे अग्रसित हो।


- रंजना

June 15, 2007

कर्म और भाग्य

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(मेरी पुस्तक “गैटिंग बेसिक्स राइट इन अस्टॉलोजी” से उद्धरित व भाषा-रूपांतरित)

प्रायः लोग इस भ्रम के साथ जीवन व्यतीत करते हैं कि उन्होंने अपना भाग्य खुद बनाया है। वे इस माया में खुश हैं तो उन्हें रहने दो। किंतु सत्य यह है कि भग्य हमें बनाता है। वह इतना स्वतंत्र और शक्तिमान है कि हमें अपनी इच्छा से बहा ले जाता है। यहाँ यह विचार करना आवश्यक है कि यदि सब कुछ पूर्व-निर्धारित है तो ज्योतिष क्या है और उसकी आवश्यकता क्या है?

आइये एक चर्चा का भाग बनें!

जैसा कि मैं हमेशा कहता हूँ कि समाज में ज्योतिषी के अलावा सब अंधे हैं। यहाँ कुछ बातें स्पष्ट करना आवश्यक है। हर वह व्यक्ति ज्योतिषी है जो किसी न किसी दैवी विद्या से जुडा है। उससे अधिक और महत्त्वपूर्ण है कि हर वह व्यक्ति जो ज्योतिष के नाम पर समाज को ठग रहा है, या अपने कच्चे लालच के लिए कुप्रचार कर रहा है ज्योतिषी नहीं है, केवल पाखण्डी है।

आइये चर्चा करें -

भाग्य को एक खेल के उदाहरण से देखें। खेल के स्पष्ट नियम और दायरे हैं। फिर भी खिलाडी ज़रूरत या पारिस्थितिक दबाव में नियम तोड ही देते हैं। वहीं खेल के दौरान कुछ खिलाडी उभरते मौकों को भाँप कर उनका सही लाभ उठाते हैं। मैं जो पक्ष रखना चाहता हूँ वह यह है कि भाग्य के अन्दर ही स्वायत्त्ता के लिए भी स्थान रहता है। इसी कारण मैं हमेशा कहता हूँ कि केवल ज्योतिषी के पास नेत्र हैं। वे नेत्र जिनके द्वारा वह किसी भी के जीवन-ऊर्जा के बहाव को देख सकता है। उसके आधार पर वह उस व्यक्ति को जीवन में आर्थिक, सामाजिक, भौतिक व आध्यात्मिक लक्ष्य निर्धारित करने और उनकी पूर्त्ति में सहयता कर सकता है।

मैं अकसर कहता हूँ कि ज्योतिष वयक्ति को जलधारा के साथ तैरने का मार्ग बताती है। हाँ यदि फिर भी कोई उसके विपरीत तैरना चाहे तो कुछ समय तक तो अच्छा लग सकता है, पर उसका थककर डूबना निश्चित है।

फिर भी मैं इस चर्चा को पाठ्कों के विचार के लिए खुला छोडता हूँ। मैं केवल अपन पक्ष रख सकता हूँ, उसे मानना या नहीं मानना हर व्यक्ति का अपना विवेक है।

संजय गुलाटी मुसाफिर

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June 14, 2007

Destiny and Freewill

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(From my book: Getting Basics Right in Astrology)
Many times people think that they have been driving the vehicle of their destiny. Let them feel so! But the truth is “Destiny Drives Us in the Vehicle!” It takes us where it wants to. So an intelligent question arises “What’s the use of Astrology? If everything was predestined what & where comes the need for Astrology?”

Lets have a healthy discussion!

As I always say “Everybody in the world except an astrologer is blind.” Here I need to specify two facts. Firstly the term astrologer includes anybody and everybody who is blessed with knowledge of any occult science. Second is more important and significant. The term Astrologer, I use, DOES NOT AT ALL include any one and everyone who is making fool of society by pretending to be a learned astrologer and fooling them for mere financial interests.

Lets try to understand:

Destiny is like a football game. Laid out boundaries to play within, clearly laid out rules. There is nothing as such Grey Matter. Yet under time of stress or under specific needs players tend to brake rules. Some who sense opportunities well, tend to utilise it in fruitful manner and thus score well.My point to explain is that there always remains the room of freewill within the framework of Destiny. Therefore an astrologer is the only one with vision, the vision to foresee the framework of individual’s destiny. Astrologer thereby through good analysis of this framework can help individual set his social, financial, material and spiritual targets and help him achieve them as well with minimum efforts.

I often explain it like – Astrology helps individual to swim with the water stream. Yet anybody want to be adventurous - Swim against the stream. Waste of time and energy is assured if not drowning.

Yet I leave this discussion open to every individual’s own perception of destiny and freewill. I can only explain facts not make anyone understand it.

Sanjay Gulati “Musafir”

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June 09, 2007

थकावट भरी जिन्दगी से निजात पाने का अचुक तरीका

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उफ्फ कितना थक गया हूँ !!!
आजकल की एक आम समस्या है, आज के इस परिवेश मे हमारे पास जितना वक्त है उससे कही ज्यादा काम है।
कभी-कभी तो ऐसा भी लगता है कि काश ये दिन 24 घंटे की जगह कुछ और बडे होते।
अब हमारी ये ख्वाहिश तो पूरी होने से रही, और ना ही हम आज का काम कल पर टाल सकते हैं, तो फिर कोई ऐसा तरीका होना चाहिये, जिससे हम आज की भागती हूई जिन्दगी के साथ भी रहें और फ्रेश-फ्रेश भी रहें।
तो बस आज कुछ ही तरीकों पर नजर डाल रही हूँ।
1.
रोज सुबह बिस्तर छोडने के पहले, झटके के साथ 10-10 बार शवासन और मृतकासन कर लें। मेरा मतलब पहले शवासन फिर मृतकासन, फिर शवासन फिर मृतकासन, यह प्रक्रिया 10 मिनट का समय लेगी, और दिन भर चुस्त रहने मे मदद करेगी।
रात को सोते वक्त भी यह प्रक्रिया दुहरा सकते हैं, अच्छी नींद आती है।
2.
सुबह उठकर बाये हाथ के लम्बाई मे ठीक बीच एक बार दाहिने हाथ के अंगुठे से दबाव डालें। यह जीवनी शक्ति को बढाने का कारगर नुस्खा है।
3.
जो शख्स समान्य से ज्यादा थकान का अनुभव करते हों, वस सुबह पानी प्रयोग करें, नियमित प्रयोग के बाद चुस्ती-फूर्ती आने लगेगी।
3.
काम करते हूए उसे बोझ के समान ना लेवें।
4.
काम के दौरान बीच बीच मे शिथिलन प्रक्रिया अवश्य अपनायें, इससे काम के दबाव से मुक्ति मिलती है।
5. Metaphysist
हूँ ना तो आखिरी मे अपनी वाली बात भी कह जाऊँ, Meditation for working power की प्रक्रिया जरूर सीखे, इससे आप एक साथ ढेर सारे काम कर सकेंगे, वो भी बिना थके। :)
इन सब प्रक्रियाओं का नियमित अभ्यास करें और रोज की थकावट भरी जिन्दगी से दूर सफल और खुशहाल जिन्दगी की तरफ अग्रसर हों।
इनके साथ इसका भी प्रयोग कर सकते हैं।


6.
पिरामीड थेरेपी का भी इस्तेमाल करें, विधी समान्य सी है, औरा रीडर से चेक करा लें, कि कौन से रंग की पिरामीड आपके लिये ठीक रहेगा, और उसे अपने साथ रखें।
7.
सही ज़िरकॉन का चुनाव करें और तनाव मुक्त रहें।
6.
आपके मूड के अनुरूप संगीत का चुनाव कर लें।
8.
समय समय पर अपने आपको अपने साथ जीने का वक्त दें।
9.
गर्मीयो के लिये खास सीत्कारी प्राणायाम अवश्य करें।
10.
यूँ तो सर्दी का मौसम नही हैं तो अगली मौसम के लिये आगामी सुचना, :) सर्दियों मे सूर्य भेदी प्राणायाम अवश्य करें।
और अंतिम अपने आपको जरूर जाने, कि आप किसलिये बने हैं, अगर आप आम का बीज हैं तो बेर का पेड बनने की बेकार कोशिश ना करें। :)

अपना तकिया कलाम... इस विषय से समबन्धित किसी भी प्रकार की जानकारी के लिये हमसे सम्पर्क करें avgroup@gmail.com या ranjanabhatia2004@gmail.com पर :)
अगर किसी शख्स को हमारे विषय से सबन्धिक किसी खास पक्ष के बारे मे जानकारी लेने की इच्छा हो तो भी हमे जरूर बतायें, हमारी कोशिश रहेगी कि उस खास विषय पर अगली पोस्ट लिखें।
तब के लिये टाटा बाय-बाय अलविदा। :)

June 04, 2007

स्मरण शक्ति'

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मनुष्य में जो संपूर्णता गुप्त रूप से विद्यमान है, उसे प्रत्यक्ष करना ही शिक्षा का कार्य है। - स्वामी विवेकानन्द

इसी तथ्य को ध्यान मे रखते हुये, महीनों के शोध से मैंने 'स्मरण शक्ति' बढाने के लिये इस पाठ्यक्रम को बनाया है।

कमजोर याददाश्त से होने वाली परेशानियों से कौन वाकिफ नही है!

स्कूल कॉलेज, ऑफिस में समाज में इस कारण कई बार हताश, निराश और अपमानित होना पडता है। इन घटनाओं के कारण इंसान संकुचित स्वभाव का होता जाता है, घोर निराशा में डूबकर समाज से कट कर रह जाता है, या चिड़चिडा़ और क्रोधी हो जाता है, जिससे लोग उसकी और अवहेलना करने लगते हैं। ये दोनों बातें इंसान के वर्तमान और भविष्य पर बहुत गहरा और बुरा असर डालते हैं।

शायद इसी कारण हमारे पूर्वजों ने "विद्या ददाति विनयं" के बात कही है।

कमजोर याददाश्त के कारक-

जब तक हम कमजोर याददाश्त के कारक को नही समझेंगे इसका इलाज नहीं कर पायेंगे इसलिये पहले संक्षेप में ही सही एक नज़र यहां भी डाल लें।

1. पहली बात तो हम सभी इंसान अपने दिमाग का सिर्फ 10-20% ही उपयोग कर रहे हैं। यह भाग दो तरह के 'स्मृति भण्डारण' में बंटा हुआ है -

  • अस्थायी भण्डारण
  • स्थायी भण्डारण

अस्थायी भण्डारक कोशिकाओं में कोई बात कुछ देर के लिये याद रहती है, फिर मिट जाती है, जबकि स्थायी भण्डारक कोशिकायें, अच्छी याददाश्त की कारक होती हैं।

यहां भी ध्यान देने योग्य बात यह है कि, स्थायी भण्डारक कोशिकायें सिर्फ